काम के लिए यहां से गुजरती आबादी को देखकर बरबस ही चार्ली-चैपलिन की फिल्म 'मॉडर्न टाइम्स' की याद आ जाती है। ये मज़दूर आबादी इक्कसवीं सदी में भी दोहरी गुलामी झेलने को मजबूर है और एक तरफ कारखाना मालिकों की गालियों, डांट-फटकार, घूसे-थप्पड़ की मार, तो दूसरी तरफ भोरगढ़ गांव के मकान मालिकों के ऑक्टोपसी पंजे के बीच फंसे रहने को मजबूर है। यहां के मकान मालिक मनमाने रेट पर बिजली का भुगतान करते हैं तथा अपने घरों में खोली हुई दुकानों से ही राशन व अन्य सामान लेने के लिए मजबूर करते हैं। ऐसा ना करने पर मज़दूरों से मकान खाली करवा लेते हैं। कारखाना मालिक तो उन्हें मनमाने तरीके से गुलामों-जानवरों की खटाते ही हैं। दलाल तथा गद्दार ट्रेड यूनियनों की करतूतों से भी यहां की व्यापक मज़दूर आबादी निराश-हताश है। इन मज़दूरों के चेहरे पर इस छटपटाहट की शिनाख़्त की जा सकती है। बस एक सब्र का बांध है जिसने इनके गुस्से को फूटकर धधकते लावे की तरह बहकर बाहर निकलने से रोका हुआ है।
आज सुबह जब यूनियन के कार्यकर्ता उनके बीच पहुंचे तो काम पर पहुंचने की जल्दी के बावजूद उन्होंने साथियों की बात सुनी, पर्चे लिए और अपने नाम व पते नोट कराए।
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